Friday, December 10, 2010

Kaun Disha me chala re bahuria

ना जाने कहाँ जा रहा है आदमी
अपनी ही धुन में
कोशिश करते करते जीने की
ना जाने क्यूँ मरा जा रहा है आदमी

छोटी सी उम्र में हैं चेहरे पे झुर्रियां
माथे पे पड़े हैं ना जाने कितने बल
एक राह दिखी तो चल पड़े
छुटियों में भी काम किये जा रहा है आदमी

संवेदना को दूर कहीं देखा था उसने कभी
कई बरस पहले बारिश में भीगा था वो कभी
मिटटी की खुशबू को बस यादों में ही महसूस किया था
ना जाने किस ओर चला जा रहा है आदमी

शायद किसी पिछले जनम में बगीचे में खाए थे आम
किसी पुराने मकान में हासिल किये थे वो मुकाम
याद नहीं कब आलू से मिटटी झाड़ के सब्जी बनायीं थी
पर उस समय तो यूँ hygiene की आंधी ना आई थी

नौकरी और प्रोग्रेस की दौड़ में फंस  चूका है आदमी
कांच के महलों से घिर चूका है आदमी
चिट्ठी लिखे ज़माना हो गया आज
दिल की बात कब जुबान पे लाएगा आदमी

दिल खोल के हँसना क्या है
याद नहीं इसे
सिले होंठों की बंदिश कोई क्या जाने
lol के ज़माने में कोई क्या ठहाके मारे

चाय की चुस्कियों का है कोई जोड़
हाथ से बुने sweater का क्या है कोई तोड़
machine made के ज़माने में finesse की चीज़ें आती हैं
रंगोली भी बाज़ार से लाके फर्श पे चिपकाई जाती है

ना जाने किस ओर चल पड़ा है आदमी
बेखुदी से खुदगर्जी के सफ़र पे निकल पड़ा है आदमी...

2 comments:

  1. Sir.. Honestly your are lifting the standards higher and higher with every new note.. and this one touches the heart like no other.. reminded me of the song from Pyaasa, lyrics by Saahir Ludhiyanvi.. Yeh mahalo yeh takhto yeh taajo ki duniya.. :-)

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  2. very touching & thought provoking.........
    the best part was
    दिल खोल के हँसना क्या है
    याद नहीं इसे
    सिले होंठों की बंदिश कोई क्या जाने
    lol के ज़माने में कोई क्या ठहाके मारे

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